डीड राईटर दो वक्त की रोटी के मोहताज

उत्तर प्रदेश गोरखपुर मंडल
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विनोद प्रजापति उर्फ सनोज की रिपोर्ट

सबसे कम मजदूरी में काम कर रहे सहकारिता विभाग के कर्मचारी

उ.प्र . सहकारी ग्राम्य विकास बैंक के गोरखपुर शाखा के अवैतनिक डीड राइटर को अप्रैल से दिसंबर माह तक 108 अनुबंध पत्र तैयार करने का काम मिला था । इन नौ महीनों में इस कार्य से उसकी कमाई ( प्रति अनुबंध पत्र पचास रुपये के दर से ) हुई सिर्फ पांच हजार चार सौ रुपये । यानि कि हर माह केवल छः सौ बीस रुपये । ऐसे में यदि कहा जाये कि डीड राइटर का पेशा फिलहाल भुखमरी को दावत देने वाला है , तो यह अतिशयोक्ति नहीं । यह तो एक बानगी है । कमोबेश इसी तरह के बदतर हालात से मण्डल के सभी बीस डीड राइटर जूझ रहे हैं । रुद्रपुर , खलीलाबाद , बस्ती , हरैया , गौरतलब है कि उ.प्र . सहकारी ग्राम्य विकास बैंक की मण्डल में बीस शाखाएं हैं । ये शाखाएं गोरखपुर , बांसगांव , खजनी , सहजनवा , महाराजगंज , निचलौल , नौतनवा , खलीलाबाद , फरेंदा , पडरौना , हाटा , देवरिया , सलेमपुर , डुमरियागंज , बांसी और सिद्धार्थनगर में काम कर रही हैं । हर बैंक में एक – एक डीड राइटर एक साल के अनुबंध पर शाखा प्रबंधक स्तर से रखा जाता है । हर साल इनके लाइसेंस नवीनीकरण किया जाता है । वे सुबह दस बजे बैंक पहुंचते हैं और शाम पांच बजे तक बैंक में ही रहते हैं । इस दौरान वे लोन लेने वाले काश्तकारों की राह देखते हैं । का इनके जिम्मे होता है लोन लेने वाले काश्तकारों का पेज के इस पत्र तैयार करना । पांच पत्र में काश्तकार का खसरा खतौनी से लगायत पूरा ब्यौरा होता है . इसके अलावा डीराइटर डीड रजिस्टर भरता है और उसकी तीन प्रतियां बना कर संबंधित कार्यालयों में जमा करता है । जिन तहसीली बैंक की शाखा नहीं है वहां के समीप के बैंक में डीड राइटर का काम करने वाले की परेशानी और भी बढ़ जाती है । उसे लोन लेने वाले काशाकार का अनुबंध पत्र जिस तहसील का वह ( काश्तकार ) है वहां के संबंधित कार्यालय में अपने खर्चे पर जा कर जमा करना पड़ता है इतना काम करने वाले डीड राइटर को इसके बदले मिलते हैं सिर्फ दस रुपये । यह दस रुपये बतौर फीस ऋण लेने वाले से जमा कराया जाता है । फीस की यही दर सन् . 1990 स ] प्रभावी डालांकि 1985 तक इसके लिए केवल पांच सय मिलता था । सिर्फ कम पैसा मिलना ही इनकी दुश्वारियों का सबब नहीं है । चूंकि हर साल अप्रैल से 30 जून तक बैंक की वसली का काम चलता है । लिहाजा इस बीच ऋण से संबंधित काम ठप रहता है । ऐसे में डीड राइटर की यह ड़ी बहुत कमाई भी बंद जाती है । जाहिर इस दौरान उनके पूरे कुनबे लिए फांकाकशी की नौबत रहती है । ऐसा नहीं है कि इस मसले को डीड राइटरों हुक्मरानों के सामने नहीं रखा । रखा पर उसे अनसुना कर दिया गया । एक बार तो उन्हें बतौर अध्यक्ष डीड राइटर संघ के प्रदेश अध्यक्ष नान्हू प्रसाद का कहना है कि कई बार इस मसले को लेकर वड़े नेताओं से मिल कर गुहार लगायी गयी , पर सुनवाई नहीं हुई । बकौल श्री प्रसाद इस मसले को उन लोगों ने उ . प्र . सहकारी ग्राम्य विकास बैंक लि . के मौजूदा सभापति के पास भी रखा है । वह कहते न्याय मिलता है या मामला रहता है और हम लोगों को इसी तरह भुखमरी का शिकार होना पड़ता है । हैं कि देखिए यूं ही लटका स्टोर कीपर समायोजित करने की भी बात उठी पर हालत वही ढांक के तीन पांत । ये डीड राइटर न्याय के लिए अपनी आवाज तब से उठा रहे हैं , जब से सूबे के मौजूदा मुखिया मुलायम सिंह यादव प्रदेश के सहकारिता मंत्री थे ।