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वृद्धावस्था में साधना होती नहीं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज

Published on: 25-06-2024

कुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य विद्या शिरोमणि परम पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी

महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा तत्व भवे किम शरणं —–कारिका आई है संसार में क्या शरण भूत है यहां पर देवेंद्रो का भी विलय देखने में आता है वहां पर हरिहर ब्रह्मा इत्यादिक और विशेष शक्ति को लेंगे तो जीव है संसार में उनका भी विलय देखने में आता है तो सामान्य व्यक्ति की क्या कथा है

।हालांकि स्वर्गीय जो देव हैं सागरोपम आयु को लिए होते हैं। इसके उपरांत भी उनका विनाश देखने में आता है। उन्हें अमर संज्ञा है हम और आपकी अपेक्षा से अन्य गतियां में जो आयु है उसकी तुलना में उनकी आयु बहुत दीर्घता को लेकर के होती है। सागरोपम आयु है और अपने पास परमोपम भी नहीं पूर्व कोटी की भी नहीं। बड़ी मुश्किल से 100 साल के भी व्यक्ति एकाध देखने को मिल सकते हैं ।

60-65- 70-75 हो गया लास्ट के चार-पांच साल तो टिक करके बैठ जाते हैं और वह भी आयु समाप्त हो जाती फिर उनको टिकाते हैं टिक करके बैठने की क्षमता समाप्त हो गई टिका देते हैं

जीवन का अंत हो जाता है ।अब आप सोच लो संयम धारण करने इतनी अल्प आयु है और विषयों को भोगने के लिए तो दीर्घायु है। दुर्लभता तो है असंयम के साथ जीवन व्यतीत करने के लिए सागरोपम आयु के साथ तृप्ति नहीं हो पाती। क्यों नहीं हो पाती क्योंकि शरीरासृत जो सुख है वह विनाशशील ऐसा कहा गया है।अग्निक सुख प्राप्त करना चाहो तो वैश्विक सुख है क्या मानो जीर्ण तृण के समान मान लेते हैं ।विषयों में सुख नहीं है मानना अलग है मान्यता अथवा सिद्धांत का विषय बनने के उपरांत भी त्याग का जब समय आता है वह पुनः आगे पीछे सोचता है हम बाद में देख लेंगे ।बाद में कब देखोगे जब अंत समय आ जाता है उस समय देखने की क्षमता नहीं ।वृद्धावस्था में साधना होती नहीं इसलिए कहा है यावत—–

  • वृद्धावस्था में श्रम के अलावा कुछ नहीं होता शारीरिक क्षमता भी समाप्ति पर होती है ।मनोबल भी नहीं क्षीण मनोबल, वचनबल, कायबल सारी की सारी इंद्रियां शिथल होती है ।उस समय आप साधना करना चाहो तो संभव नहीं और जिस समय अवसर साधना के लिए रहता है उस समय वह सोचता बाद में कर लूंगा ।

भोजन थोड़ी करना है साधना करने के लिए उत्साह चाहिए और उत्साह समाप्त हो जाता है। दो-दो व्यक्ति पकड़ रहे हैं बैठने उठने की क्षमता नहीं पैरों में शक्ति नहीं है आंखों में रोशनी धीरे-धीरे समाप्त हो रही है स्मरण शक्ति भी डाउन होती चली जा रही है। ऐसी स्थिति में अरिहंत अरिहंत करने के लिए भी बल बचा नहीं आप क्या कर लोगे महाराज ऐसा कोई मंत्र बताओ हमने कहा णमोकार मंत्र का जाप करो महाराज ये तो करते ही हैं तो करते तो इसका अर्थ क्या पंचपरमेष्ठी की आराधना है इसको छोड़कर और मंत्र की ओर ध्यान क्यों जा रहा। आप चाहते क्या हैं आखिर पंच परमेष्ठी की आराधना करने से कल्याण होता है ।लेकिन उस णमोकार मंत्र से कल्याण कर नहीं पा रहा है इसलिए दूसरे मंत्र की बात करता है। महाराज यह तो मैं करता ही हूं तो क्या नहीं करते बताओ स्वरूप का परिज्ञान न होने के कारण उसका मन नहीं लग रहा। जब तक मन केंद्रित नहीं होगा तब तक आपका मन विक्षिप्त ही रहेगा क्षुब्ध रहेगा। हमारा उपयोग अन्यत्र चला जा रहा है कि पदार्थ आपके उपयोग में आ रहे हैं। पदार्थ का उपयोग पदार्थ की ओर जा रहा है इसका निर्णय करना है ।आज बोलो ज्ञेय पदार्थ अनंत है आपको वाध्य कर रहे हैं मुझे जानो मुझे ग्रहण करो मेरी ओर देखो तो कुछ भी नहीं कह रहे हैं उपयोग हमारा जा रहा है स्पष्ट है अपराध हमारा है दूसरे का नहीं ।पक्की बात है दूसरे का क्या अपराध है इसमें किसी ने कहा महाराज वह बार-बार हर बार हमें घूर कर देख रहा आपने देखा तभी तो देखने में आ रहा। आपने देखा क्यों उस ओर आपकी दृष्टि नासाग्र है तो घूर कर देखें चाहे ना देखे हमें ज्ञात ही नहीं कौन देख रहा है नहीं देख रहा है। बार-बार हमारी ओर ही देख रहे देखा क्यों हमें डर लगता आपने देखा क्यों किसने वाध्य किया उपयोग हमारा ही जाता है

इसलिए उपयोग केंद्रित करने के लिए बार-बार पुरुषार्थ करो ऐसा कहा जाता है।

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