कारगिल विजय दिवस 2026 : शौर्य, बलिदान और भारत की अटूट भावना को श्रद्धांजलि

भारत इस वर्ष कृतज्ञता और सम्मान के साथ 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है। यह अवसर 1999 में कारगिल युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय की स्मृति को पुनर्जीवित करता है, जब भारतीय सैनिकों ने अद्वितीय शौर्य और अटूट दृढ़ता का परिचय देते हुए करगिल की बर्फ से आच्छादित चोटियों को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराया था। 26 जुलाई 1999 को लद्दाख की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं पर तिरंगा एक बार फिर गर्व के साथ लहराया, जो वीरता, सर्वोच्च बलिदान और भारत की अदम्य राष्ट्रीय भावना का अमर प्रतीक बन गया।

कारगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक

कारगिल युद्ध भारत के सैन्य इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक है। यह भारतीय सैनिकों की अदम्य वीरता, अद्वितीय साहस और अटूट संकल्प का प्रतीक है तथा राष्ट्रीय गौरव एवं प्रेरणा का एक स्थायी स्रोत बना हुआ है।

यह दिवस उन सभी वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया

करगिल विजय दिवस उन सभी वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके अद्वितीय त्याग ने राष्ट्र की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति भारत के अटूट संकल्प को और सुदृढ़ किया। इस संघर्ष ने देश की सैन्य तैयारियों, रणनीतिक सोच और रक्षा दृष्टिकोण को नई दिशा प्रदान की। करगिल से मिली सीख आज भी भारत की सशक्त, आत्मनिर्भर व सुरक्षित भविष्य की यात्रा का मार्गदर्शन करती है और प्रत्येक भारतीय को यह संदेश देती है कि साहस, बलिदान, एकता एवं राष्ट्र की संप्रभुता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं।

ऑपरेशन विजय की ओर बढ़ते कदम

ज्ञात हो, करगिल युद्ध 1999 की गर्मियों में लाहौर घोषणा के तुरंत बाद शुरू हुआ। जब देश का अधिकांश भाग भीषण गर्मी का सामना कर रहा था, उसी समय करगिल की बर्फ से ढकी दुर्गम पर्वत चोटियों पर भीषण संघर्ष जारी था। पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की और सर्दियों के दौरान अस्थायी रूप से खाली की गई सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्वतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया।

पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी आतंकवादियों के वेश में एलओसी पार कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया

दरअसल, यह घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा संचालित ‘ऑपरेशन बद्र’ का हिस्सा थी। इस अभियान के तहत पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी आतंकवादियों के वेश में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भारतीय चौकियों पर अवैध कब्जा कर लिया। उनका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच संपर्क को बाधित करना, सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात भारतीय सैनिकों को अलग-थलग करना तथा भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव बनाना था।

स्थानीय निवासियों ने 3 मई 1999 को सबसे पहले करगिल सेक्टर में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना दी। इसके बाद स्थिति की पुष्टि के लिए तत्काल टोही गश्ती दल भेजे गए। व्यापक जमीनी गश्त व हवाई निगरानी के माध्यम से जल्द ही घुसपैठ के वास्तविक स्वरूप और उसके दायरे का पता चल गया। घुसपैठियों ने श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर निगरानी रखने वाली सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंची चोटियों पर अपनी मजबूत स्थिति बना ली थी। इनमें से अनेक चौकियां 5,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित थीं, जिससे सैन्य अभियान अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो गया।

ऑपरेशन विजय का आगाज

भारत ने इस चुनौती का सामना संयम, दृढ़ संकल्प और अटूट साहस के साथ किया। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) को पार नहीं किया जाएगा। अभियान का उद्देश्य स्पष्ट था—दुश्मन के कब्जे वाली प्रत्येक भारतीय चौकी को पुनः अपने नियंत्रण में लेना। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। भारतीय वायु सेना 26 मई 1999 को ऑपरेशन सफेद सागर के माध्यम से इस अभियान में शामिल हुई, जबकि भारतीय नौसेना ने भी पूर्ण तत्परता के साथ अपनी तैनाती सुनिश्चित की। इस प्रकार तीनों सेनाओं ने समन्वित और प्रभावी अभियान चलाकर भारत के अटूट संकल्प का परिचय दिया।

ऑपरेशन विजय के दौरान ‘रोकना, खदेड़ना और दोबारा कब्जा न करने देना’ की रणनीति अपनाई गई। श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर निगरानी रखने वाली सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऊंचाइयों को पुनः अपने नियंत्रण में लेना सर्वोच्च प्राथमिकता थी। इसके लिए अतिरिक्त सैनिकों, तोपखाने, इंजीनियरिंग इकाइयों, विशेष उपकरणों और रसद संसाधनों की तीव्र गति से तैनाती की गई। भारतीय सैनिकों ने दुश्मन की लगातार गोलाबारी के बीच लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई की तथा जमा देने वाली ठंड, ऑक्सीजन की कमी और अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना किया।

युद्ध की दिशा बदलने वाली निर्णायक लड़ाइयां

आपको बता दें, टोलोलिंग की लड़ाई इस अभियान की पहली प्रमुख सफलताओं में से एक थी। भारतीय सैनिकों ने मई 1999 के अंतिम सप्ताह में इस क्षेत्र में अभियान शुरू किया। कठिन संघर्ष के बाद 13 जून 1999 को पॉइंट 4590 और टोलोलिंग पर पुनः भारतीय नियंत्रण स्थापित कर लिया गया। इस विजय ने आगे के सैन्य अभियानों का मार्ग प्रशस्त किया और भारतीय सेना को महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त दिलाई।

टाइगर हिल की लड़ाई कारगिल युद्ध के सबसे निर्णायक अध्यायों में से एक रही। द्रास सेक्टर की सबसे महत्वपूर्ण और सामरिक दृष्टि से अत्यंत अहम चोटियों में शामिल टाइगर हिल भारतीय सेना के प्रमुख लक्ष्यों में से एक थी। अद्वितीय साहस और कठिन परिस्थितियों में चलाए गए अभियान के बाद 4 जुलाई 1999 को भारतीय सैनिकों ने इस चोटी पर पुनः कब्जा कर लिया। इस विजय ने युद्ध की दिशा निर्णायक रूप से भारत के पक्ष में मोड़ दी और अंतिम सफलता का मार्ग प्रशस्त किया।

इंट 4875, बटालिक, मुश्कोह घाटी और कक्सर क्षेत्रों में भी भीषण संघर्ष हुए। भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय देते हुए दुश्मन के कब्जे वाली प्रत्येक सामरिक चोटी को पुनः अपने नियंत्रण में लेने के लिए कठिन परिस्थितियों में एक-एक मोर्चे पर निर्णायक लड़ाई लड़ी।

लगभग तीन महीने तक चले सतत सैन्य अभियानों के बाद भारत ने अपने सभी कब्जे वाले क्षेत्र और चौकियां पुनः हासिल कर लीं। उल्लेखनीय है कि यह पूरी कार्रवाई भारत ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किए बिना पूरी की। इस संयमित, पेशेवर एवं दृढ़ सैन्य अभियान ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान दिलाया तथा उसकी सैन्य क्षमता और जिम्मेदार आचरण को स्थापित किया।

एक ऐसी जीत जिसने देश को प्रेरित किया

करगिल युद्ध भारत के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बन गया। इसने भारतीय सैनिकों की अद्वितीय वीरता, सर्वोच्च बलिदान और अटूट संकल्प का परिचय दिया तथा पूरे राष्ट्र को गर्व और एकता के सूत्र में बांध दिया। 14 जुलाई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की और सशस्त्र बलों के साहस, बलिदान तथा समर्पण को नमन किया।

भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेगा

इस ऐतिहासिक विजय ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेगा। इसने सशस्त्र बलों के प्रति देशवासियों के विश्वास को और सुदृढ़ किया तथा भारतीयों की अनेक पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा, साहस और बलिदान की भावना से प्रेरित किया।

करगिल की पहचान बना शौर्य

करगिल विजय अनगिनत वीरता, साहस और सर्वोच्च बलिदान की गाथाओं का परिणाम थी। पुनः प्राप्त की गई प्रत्येक चोटी भारतीय सैनिकों के अदम्य संकल्प, असाधारण पराक्रम और मातृभूमि के प्रति उनके समर्पण की साक्षी है। ऑपरेशन विजय में प्रत्येक सैनिक का योगदान महत्वपूर्ण था, किंतु कुछ अद्वितीय वीरता के उदाहरण इस संघर्ष के अमर अध्याय बन गए। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन विजयंत थापर तथा अनेक अन्य वीर सैनिक साहस, नेतृत्व और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा के प्रतीक बनकर उभरे।

राष्ट्र ने इन अद्वितीय बलिदानों और वीरता को अपने सर्वोच्च सैन्य अलंकरणों से सम्मानित किया। करगिल युद्ध के दौरान प्रदर्शित असाधारण शौर्य के लिए 4 सैनिकों को परमवीर चक्र, 9 को महावीर चक्र और 55 को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त 1 सैनिक को सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक, 6 को उत्तम युद्ध सेवा पदक तथा 8 को युद्ध सेवा पदक प्रदान किए गए। वहीं 83 सैनिकों को सेना पदक और 24 वायु योद्धाओं को वायु सेना पदक से सम्मानित किया गया। ये सम्मान करगिल युद्ध के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा प्रदर्शित अद्वितीय साहस, नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के अमिट प्रतीक हैं।