दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी बच्चे की कस्टडी उसकी मां से केवल इस आधार पर नहीं छीनी जा सकती कि मां को अयोग्य साबित किए बिना ही ऐसा किया जाए। अदालत का यह फैसला माता-पिता के अधिकारों और बच्चे के हित के बीच संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है।
कस्टडी से जुड़े मामलों में अदालतें हमेशा बच्चे के सर्वोत्तम हित को सबसे ऊपर रखती हैं। माता या पिता की क्षमता, बच्चे की देखभाल, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव जैसे पहलुओं की जांच के बाद ही फैसला लिया जाता है। इस फैसले से यह संदेश गया है कि बिना ठोस आधार के किसी अभिभावक के अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का असर भविष्य के पारिवारिक विवादों पर भी पड़ेगा। इससे कस्टडी के मामलों में साक्ष्य और तथ्यों के आधार पर फैसला लेने की प्रक्रिया को और मजबूती मिलेगी। साथ ही, यह फैसला बच्चों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में भी एक अहम कदम है।



