सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी के मार्च को लेकर सख्त टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को कोई डरा या धमका नहीं सकता। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह अच्छी तरह जानता है कि अदालत के बाहर क्या कहा जा रहा है और अंदर क्या दलीलें दी जा रही हैं।मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी खेमा मार्च को लोकतांत्रिक अधिकार बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश से जोड़कर देख रहा है। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह टिप्पणी न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को दोहराती है। उनके मुताबिक किसी भी मामले का फैसला केवल कानून, साक्ष्य और संविधान के आधार पर होता है, सड़क की राजनीति के आधार पर नहीं। अदालतों की गरिमा बनाए रखना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है।अब सबकी नजर इस बात पर है कि मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट क्या रुख अपनाता है और राजनीतिक दल इस टिप्पणी पर आगे क्या प्रतिक्रिया देते हैं।