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राष्ट्रीय खेल दिवस पर विशेष मेजर ध्यानचंद की साधना स्थली हीरोज ग्राउंड को मिले विश्व धरोहर का दर्जा:बृजेंद्र यादव ध्यानचंद से अशोक कुमार तक, अनेक अंतरराष्ट्रीय हॉकी सितारों को तराशने वाली ऐतिहासिक धरती के संरक्षण की उठी मांग

राष्ट्रीय खेल दिवस पर विशेष मेजर ध्यानचंद की साधना स्थली हीरोज ग्राउंड को मिले विश्व धरोहर का दर्जा:बृजेंद्र यादव ध्यानचंद से अशोक कुमार तक, अनेक अंतरराष्ट्रीय हॉकी सितारों को तराशने वाली ऐतिहासिक धरती के संरक्षण की उठी मांग

झांसी। भारतीय हॉकी के इतिहास में झांसी का हीरोज ग्राउंड केवल एक खेल मैदान नहीं, बल्कि देश की गौरवशाली हॉकी विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसी ऐतिहासिक मैदान की मिट्टी में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने अपने खेल को निखारा, इसी मैदान पर उन्होंने हॉकी की बारीकियां सीखीं और बाद में नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया। राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर देश के हॉकी खिलाड़ियों और हॉकी प्रेमियों की ओर से मांग उठ रही है कि झांसी के ऐतिहासिक हीरोज ग्राउंड को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल कराने के लिए गंभीर पहल की जाए।
हीरोज क्लब की स्थापना वर्ष 1921 में झांसी में हुई थी। मेजर ध्यानचंद इसी क्लब से जुड़े और लंबे समय तक इसी मैदान पर अभ्यास करते रहे। यही मैदान उनके प्रारंभिक हॉकी जीवन की कर्मस्थली बना। यहां उन्होंने अपनी प्रतिभा को तराशा और आगे चलकर विश्व हॉकी में भारत का नाम रोशन किया। दुनिया के फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन का जो स्थान है, हॉकी की दुनिया में वही स्थान मेजर ध्यानचंद को हासिल है। देश ने उनकी महान खेल प्रतिभा के लिए उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।
ध्यानचंद और रूप सिंह ने यहीं से फहराई भारतीय हॉकी की पताका
हीरोज ग्राउंड का संबंध केवल मेजर ध्यानचंद से ही नहीं, बल्कि उनके भाई और महान हॉकी खिलाड़ी कैप्टन रूप सिंह से भी रहा है। दोनों भाइयों ने इसी मैदान पर हॉकी की साधना की और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय हॉकी की पताका पूरी दुनिया में फहराई। इस मैदान ने उस दौर को देखा है जब भारतीय हॉकी विश्व हॉकी पर अपना दबदबा कायम कर रही थी।
लेकिन हीरोज ग्राउंड की गौरवगाथा यहीं समाप्त नहीं होती। इस ऐतिहासिक मैदान ने 1975 विश्वकप विजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य और विश्वविजेता अशोक कुमार ध्यानचंद सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ियों और पदक विजेताओं को भी तैयार किया। अब्दुल अजीज, नेहा सिंह, देवेंद्र सिंह, उमेश सिंह सहित कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी इस हॉकी परंपरा से जुड़े रहे हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां इस बात का प्रमाण हैं कि हीरोज ग्राउंड लंबे समय से भारतीय हॉकी की प्रतिभाओं की पौधशाला रहा है।
अशोक कुमार के रूप में आगे बढ़ी विरासत
मेजर ध्यानचंद की हॉकी विरासत को उनके सुपुत्र अशोक कुमार ध्यानचंद ने आगे बढ़ाया। 1975 में कुआलालंपुर में आयोजित विश्वकप में भारतीय टीम की ऐतिहासिक जीत में अशोक कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पाकिस्तान के खिलाफ फाइनल में उनके निर्णायक गोल ने भारत को पहली बार विश्वकप चैंपियन बनाया। इस उपलब्धि ने हीरोज ग्राउंड से जुड़ी हॉकी परंपरा को एक और स्वर्णिम अध्याय दिया।
इस प्रकार मेजर ध्यानचंद से लेकर अशोक कुमार और आगे कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों तक, हीरोज ग्राउंड ने भारतीय हॉकी की पीढ़ियों को तैयार होते देखा है। यह मैदान गुरु-शिष्य परंपरा, खेल साधना और भारतीय हॉकी की गौरवशाली विरासत का प्रतीक है।
अंतिम स्मृति भी इसी मैदान से जुड़ी
हीरोज ग्राउंड का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह मेजर ध्यानचंद की अंतिम स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है। 3 दिसंबर 1979 को मेजर ध्यानचंद के निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार इसी हीरोज ग्राउंड में किया गया था। मैदान के एक हिस्से में उनकी समाधि भी स्थित है।
इस दृष्टि से हीरोज ग्राउंड केवल मेजर ध्यानचंद की कर्मस्थली ही नहीं, बल्कि उनकी साधना, प्रशिक्षण, उपलब्धियों और अंतिम स्मृति को अपने भीतर संजोए हुए ऐतिहासिक स्थल है।
100 वर्ष पूरे हुए, फिर भी आधुनिक सुविधाओं का इंतजार
वर्ष 2021 में हीरोज क्लब ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए। एक सदी पुरानी इस गौरवशाली हॉकी परंपरा के बावजूद मैदान आज भी आधुनिक सुविधाओं का इंतजार कर रहा है। जिस स्थान को दुनिया भर के हॉकी प्रेमियों के लिए श्रद्धा का केंद्र होना चाहिए, वहां आज तक आधुनिक स्तर का एस्ट्रो टर्फ और आवश्यक खेल सुविधाएं विकसित नहीं हो सकी हैं।
हीरोज ग्राउंड पर आधुनिक एस्ट्रो टर्फ लगाए जाने की मांग को लेकर मेजर ध्यानचंद के सुपुत्र एवं 1975 विश्वविजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य अशोक ध्यानचंद तथा परिवार के अन्य सदस्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर चुके हैं। मुख्यमंत्री की ओर से इस ऐतिहासिक मैदान पर एस्ट्रो टर्फ लगाए जाने के संबंध में प्रदेश के खेल निदेशक आर.पी. सिंह, जो स्वयं अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी रहे हैं, को निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई थी। इसके बावजूद अब तक इस दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हो सका है।
हीरोज ग्राउंड को बनाया जाए हॉकी विरासत केंद्र
अब आवश्यकता केवल एस्ट्रो टर्फ लगाने की नहीं, बल्कि हीरोज ग्राउंड को एक अंतरराष्ट्रीय हॉकी विरासत केंद्र के रूप में विकसित करने की है। यहां आधुनिक एस्ट्रो टर्फ, प्रशिक्षण केंद्र, संग्रहालय, मेजर ध्यानचंद स्मृति केंद्र, डिजिटल हॉकी अभिलेखागार और देश-विदेश से आने वाले हॉकी प्रेमियों के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
इसके साथ ही इस ऐतिहासिक स्थल के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और विरासत मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू करते हुए इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल कराने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, खेल संस्थाओं, हॉकी विशेषज्ञों और इतिहासकारों को मिलकर ठोस प्रस्ताव तैयार करना चाहिए।
यह मैदान नहीं, भारतीय हॉकी की आत्मा है
जिस मैदान पर मेजर ध्यानचंद ने हॉकी सीखी, जिस मैदान पर उन्होंने अपने सपनों को आकार दिया, जिस मैदान पर उन्होंने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया, जिस मैदान से अशोक कुमार जैसे विश्वविजेता निकले और जिसने अनेक अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारा—उस मैदान का महत्व किसी सामान्य खेल मैदान से कहीं अधिक है।
और सबसे भावुक करने वाला तथ्य यह है कि जिस मैदान की मिट्टी पर मेजर ध्यानचंद ने हॉकी की साधना की, उसी मिट्टी में उनकी अंतिम स्मृति भी समाई हुई है। इससे बड़ा किसी खिलाड़ी और उसके मैदान के बीच संबंध क्या हो सकता है?
इसलिए हीरोज ग्राउंड को केवल हॉकी का मैदान कहना उसकी महान विरासत को छोटा करना होगा। यह मेजर ध्यानचंद की साधना स्थली, भारतीय हॉकी की पाठशाला, गुरु-शिष्य परंपरा का केंद्र और कई पीढ़ियों के हॉकी नायकों की कर्मभूमि है।
राष्ट्रीय खेल दिवस पर आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करेंगे, नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करेंगे, मेजर ध्यानचंद की विरासत को आगे बढ़ाएंगे और भारत को फिर से विश्व हॉकी का सिरमौर बनाने के प्रयास करेंगे।
हीरोज ग्राउंड की मिट्टी को नमन।
मेजर ध्यानचंद की साधना स्थली को नमन।
भारतीय हॉकी की गौरवशाली परंपरा को नमन।

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